समाज का आइना हर एक बच्चा....

एडिटोरियल 

 

हर एक देश की बुनियाद उसकी युवा पीढ़ी मज़बूत करती है। युवा पीढ़ी यानी बच्चे देश को एक नए दिशा की और ले जाते हैं और शायद इसलिए उनको बचपन से सिखाया जाता है की वो देश के भविष्य हैं। उनका पालन-पोषण भी इसलिए किया जाता है जिससे वो भविष्य में जा कर अपने पैरों में खड़े हो सकें और देश को बुलंदियों तक ले जाने में उन्हें कोई तकलीफ न हो लेकिन अगर उन्हीं बच्चों का भविष्य अंधेरे में हो तब। जी हां, इस एडिटोरियल के माध्यम से हम आपको कुछ ऐसा ही बताने जा रहे हैं। एक मैगजीन ने इन सभी पहलुओं पर गौर किया है जिससे यह पता लगता है कि बच्चों का भविष्य आज के समय में किस स्तर पर है। “आरम्भ” एक ऐसे ही सोच को दर्शाता है जिसे हम आपके सामने रखने जा रहे हैं। इस सोच को अक्षरों में तब्दील करने वालीं हैं मनीषा तंवर । आइये जानते हैं उन्होंने अपने इस लेख में क्या लिखा है।  

 

लेख के बुनियाद पर..

 

बच्चे समाज का वर्त्तमान और भविष्य दोनों होते हैं। ये अपनी सकारात्मक सोच और रचनाशीलता से एक नए समाज का निर्माण करते हैं। जिस देश में बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है वो देश कभी भी तरक्की नहीं कर सकता है। यह हमारा ही नहीं बल्कि दुनिया के कई शोधकर्ताओं का मानना है।  

 

अगस्त महीने में गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से कई बच्चों की मौत हो गयी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। 28 अगस्त तक एनआईसीयू में 213 और इंसेफेलाइटिस वार्ड में 77 समेत कुल 290 बच्चे मरे हैं। ये तो वो घटना है जो सामने आ गयी और जिनसे हम भावुक हो गए लेकिन  भारत के अस्पतालों में हर साल हजारों बच्चे असमय मृत्यु का ग्रास बनते हैं, और जिसकी हमे भनक तक नहीं लग पाती है।

 

यही नहीं 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में शिशु लिंगानुपात 919 है जो कि 2001 में 927 थी। ये दोनों आंकड़े सामान्य लिंगानुपात क्रमशः 933 एवं 943 से कम हैं। ऐसे में हम अपने देश के उज्ज्वल की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इस खबर के माध्यम से हम उन सभी बच्चों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

 

बच्चों की आरंभिक शिक्षा कहानियों के माध्यम से होती है। दादा-दादी, नाना-नानी, बूआ, मौसी, माता-पिता आदि सभी के साथ में रहते हुए बच्चे सीखते हैं, हालांकि आज का समय बदल चुका है लेकिन इसका महत्व अभी भी है। विद्यालयों में शिक्षा के साथ बाल साहित्य उन्हें जीवन की शुरुआत में नैतिक मूल्यों से परिचित कराता है जिसमें हित की भावना हो व स्वयं का विकास भी। साहित्य का उद्देश्य भी तो यही है जो मनोरंजन के साथ उन्हें सही मार्ग दिखाता है।

 

बाल साहित्य का वह दौर अलग था जब बच्चे “चम्पक”, “नंदन”, “नन्हें सम्राट”, जैसी पत्र-पत्रिकाओं को पढ़कर व दादी-नानी से परियों की कहानी-कविता सुना करते थे लेकिन आज बाल साहित्य के केंद्र में वो बच्चे हैं जिनकी आंखों में सपने हैं तथा कन्धों पर उम्मीदों का बोझ रहता है। हाथों में किताबे नहीं बल्कि मोबाइल, कंप्यूटर, इन्टरनेट, टी.वी, वीडियो गेम रहता है। वो बचपन, बच्चों की मासूमियत कहीं खो सी गयी है। बच्चे समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं, ऐसे में उनका बचपन पीछे छूटता जा रहा है; लेकिन कहीं-कहीं ये परिपक्वता अच्छे रूप में दिखाई देती है।

आज बच्चे अपनी सृजनात्मकता से वर्तमान समस्याओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं।

"आरंभ" का यह अंक "बाल साहित्य विशेषांक" पर आधारित है। हिंदी साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है तथा बाल साहित्य के लेखन की परम्परा बहुत पुरानी है जिसमें पंचतंत्र की कहानियाँ, बीरबल के किस्से, सिंहासनबतीसी, बैतालपचीसी आदि बाल साहित्य में अपना विशेष स्थान रखती हैं। हिंदी में बाल साहित्य बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर लिखा गया है।

 

आज विश्व भर में बाल साहित्य लिखा जा रहा है। हिंदी साहित्य की अगर हम बात करें तो रवीन्द्रनाथ ठाकुर का नाम याद आता है, जो एक कुशल बाल साहित्यकार थे। उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, पत्र लेखन आदि विभिन्न विधाओं में बच्चों के लिए उत्कृष्ट रचनाओं का सृजन किया है। बाल रचनाएँ सिर्फ बच्चों को ध्यान में रखकर ही नहीं बल्कि हर उम्र के बाल रचनाकार को ध्यान में रखकर करनी चाहिए ताकि हर वर्ग का बच्चा बाल कहानी कविता आदि को ध्यानपूर्वक और रोचकता से पढ़े और सीखे। बच्चे सबसे ईमानदार पाठक होते हैं, वे जो भी पढ़ते और अनुभव करते  हैं, बड़ी निष्पक्षता से उसकी अभिव्यक्ति करते हैं।

 

बच्चों का दुनियावी अनुभव बहुत छोटा होता है। छोटी-सी ज़िंदगी में उनके अपने अभाव और प्राप्तियाँ होती हैं, जिन्हें कहने के लिए वो एक अपनी दुनिया रचते हैं। कभी-कभी ये अभिव्यक्तिमय दुनिया सृजनात्मकता का आवरण ओढ़ लेती है, और इस अभिव्यक्ति में कोई बनावट नहीं होती, शब्दों के आडंबर नहीं होते हैं। वहाँ एक बेबाक अभिव्यक्ति होती है। उनकी अभिव्यक्तियाँ उनकी छोटी-सी दुनिया से उपजी होती हैं, जहाँ एक तरफ़ उनके इरादे फ़लक की उचाइयों को छूने की हिम्मत रखते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ समंदर में गोते लगाते हुए उसकी गहराइयों को छू लेना चाहते हैं।  इस अंक में आप देखेंगे कि हमारे नन्हे बाल रचनाकारों ने कितनी खूबसूरती से अपना लेखन कार्य किया है। उनके लेखन में कोई बनावट नहीं है और न ही किसी लक्षित प्रभाव के लेखन की अनुभूति होती है। एक तरफ़ अर्जुन चौधरी अपनी कविता "सबका हाथ सबके साथ"में देश के विकास की बात करते हैं तो दूसरी तरफ़ आर्पणा चंद्रा देश की वर्तमान स्थिति की और इशारा करती हुई कहती हैं –"बरखा रानी अब तो आजा, किसानों की किस्मत चमका जा"। सभी बाल रचनाकरों ने अपने स्तर पर अपनी रचनाओं से देश की हर एक समस्या पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। सौम्या सिंह की कविता "ममत्व"- माँ शब्द के सम्पूर्ण भावों की अभिव्यक्ति करती है। वहीँ कोमल किंवर अपनी कविता "सुहानी सी जिन्दगी" के ज़रिए हमें फिर से बचपन में लौटने को कहती है। प्रकृति अपनी कविता "कहाँ है प्यार" के माध्यम से प्यार के नए आयाम की तरफ़ संकेत करती हैं।  आज बच्चे धीरे-धीरे इतना व्यस्त हो जाते हैं कि भविष्य की चिंता उन्हें वर्तमान में जीने नहीं देती।

 

इसके अतिरिक्त कई और बाल रचनाकारों की कविताएँ, कहानियां प्रकाशित की गई हैं जिन्हें पढ़ने पर लगता है कि ये बाल रचनाकार कैसे अपनी छोटी-छोटी किस्से कहानियों के जरिए हमें जीवन की बड़ी सीख़ दे जातें हैं जो अक्सर हम बड़े होकर भूल जाते हैं। अनेकों पुरस्कार से सम्मानित बाल कवयित्री सुहानी यादव की कविताओं का आरंभ में प्रकाशित होना बेहद ख़ुशी की बात है।  वहीँ युवा कथाकार डॉ॰ प्रज्ञा मैम का शोध-आलेख आसान नहीं है बाल-रंगकर्म बाल रंगकर्म के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते हुए उसकी चुनौतियों और संभावनाओं पर प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त अन्य बाल साहित्य की रचनाओं को भी शामिल किया गया है। आरंभ के इस अंक के संपादन का अनुभव मेरे लिए बहुत सुखद भी रहा और साथ ही बच्चों के साथ हुई अमानवीय घटनाओं को लेकर दुखद भी। हमेशा की तरह आरंभ को अपने पाठकों की प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा।

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